मदुरै मिनाक्षी मंदिर

Language : Hindi | Temple | Audios

General Information

मंदिर का समय : सुबह ५.०० से १२.३० तक & शाम ४.०० से रात १०.०० तक

टिकट : कोई प्रवेश शुल्क नहीं है.

पोशाक :

पपोशाक पहने लायक -, शर्ट , टी.शर्ट, जीन्स, पारंपरिक पोशाक, साडी , सलवार.

पोशाक जिन्हें पहने की अनुमति नहीं हैं – लुंगी, टोपी, हाफ पैंट, स्लीव लेस कपडे.

अनुमति :

सेलफोन : साइलेंट या विब्रटे मोड में लगवा दिजिए।.

पानी : पीने की पानी मंदिर में मिलती है। चाहे तो ले जा सकते हैं ।.

कैमरा : कैमरा मंदिर के भीतर ले जाना मना है.

अनुमति नहीं :

जूते : सबी प्रवेश द्वार में जूते रखने की मुफ्त जगह है.

खाद्य पदार्थ : मंदिर के भीतर प्रसाद मिलेगा.

 

Facilities

शौचालय :

शौचालय – सार्वजनिक उपयोग के लिये

1. उत्तर avanimoola सड़क पार्किंग

2. दक्षिण टॉवर के सामने.

क्लोक रूम :

लॉकर कक्ष सामान सुरक्षित रखने के लिए सबी प्रवेश द्वार पे है.

जूते स्टैंड :

वहाँ हर प्रवेश द्वार पर जूते स्टैंड है। यह एक निःशुल्क सेवा है।.

पार्किंग :

एलिस नगर कार पार्किंग, पेरियार बस स्टैंड के पास है. वहां से मंदिर आने कई बस हैं.

Food

उत्तर भारतीय भोजन :

श्री मोहन भोजनालय – पश्चिम गोपुरम गली ( हॉटेल टेम्पले व्यू के सामने).

अडयार आनंद भवन.

विदेशी भोजन :

डोमिनोस पिज़्ज़ा – के.के.नगर .

थी चोपस्टिकक्स – चीनी भोजन, के.के.नगर.

फिलस बिस्टरो – इटालियन/ अमेरिकन भोजन, के.के.नगर.

 

Checklist

  • आप मंदिर वेबसाइट http://www.maduraimeenakshi.org/ एक बार देख ले ।
  • इस मंदिर में महोत्सव की अवधि अप्रैल, मई और अगस्त के महीनों में किया जाता है । तीर्थ भीड़ बहुत हो जाएगा। ध्यान रहे ।
  • 1000 स्तंभ हॉल के लिए – प्रति व्यक्ति – 5 रु / की एक प्रवेश शुल्क है।
  • अपना ईरफ़ोन और एक्स्ट्रा बैटरी हो तो लेना न भूलें ।
  • डाटा नेटवर्क – यदि आप अपने फ़ोन पर डाटा नेटवर्क बंद करेंगे तो आपकी बैटरी ज्यादा चलेगी और आप ऑडियो गाइड इत्मिनान से सुन सकेंगे ।

The Basics

इन बुनियादी बातों पर हमारी स्मृति ताज़ा करना अच्छा है।

History

मदुरै मीनाक्षी मन्दिर द्रविण शिल्प कला का बहुत ही सुन्दर उदाहरण है। यह मन्दिर देवी मीनाक्षी और भगवान सुन्दरेश्वर को समर्पित है। कमल के फूल की तरह सुन्दर मदुरै शहर के बीचों-बीच यह मंदिर बना है। मीनाक्षी मन्दिर वास्तव में कुलशेखर पाण्डयन ने बनवाया था। चौदहवीं शताब्दी में जब एक मुगल, मालिक काफूर ने उसको लूट लिया था, विश्वनाथ नायक ने इसे फिर से बनवाया था।